खेल-खेल में सीखो जैन धर्म – बच्चों व युवाओं के लिए "देखो और सीखो" पाठशाला।Learn Jain Dharma through play – a "See & Learn" pathshala for children and youth.
प्रेरणा: श्रमण मुनि 108 श्री निर्मोह सागर जी महाराजInspiration: Shraman Muni 108 Shri Nirmoh Sagar Ji Maharajरंग चुनें, फिर किसी चित्र पर क्लिक करें – बड़ा चित्र, नाम और चिह्न देखें।Pick a colour, then click any picture for a large view, name and symbol.
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यू.जी.एस. पब्लिकेशन्स प्रा. लि. | श्रीमती विद्या जैन धर्मपत्नि स्व.श्री सुमत प्रसाद जैन
पण्डित प्रमोद शास्त्री
एवं समस्त यू जी.एस. परिवार मेरठ (. प्र.)
भीलवाड़ा (राज.)नाम : श्रमण मुनि श्री i08 निर्मोह सागर जी महाराज जन्म दिनांक. : 0। जनवरी 975 दीक्षा पूर्व नाम: बा.ब्र.श्री बृजेश कुमार जैन fi oar: श्री बालचन्द्र जी जैन All oar: श्रीमती गुलाब बाई (गजरा बाई) जी जैन जन्म स्थान : बृजपुर, जिला-पन्ना, मध्य प्रदेश शिक्षा : हाईस्कूल seat at: 206, करगुवाँ झाँसी ayer let: सीधी मुनि दीक्षा हुई मुनि दीक्षा : 4 नवम्बर 2024 दीक्षास्थल ४ सम्मेदशिखर तीर्थ, बिहार (झारखण्ड) दीक्षागुरु पं आचार्य श्री 08 विशुद्ध सागर जी महाराज मातृभाषा - हिन्दी विशेष वैयावृत्ति, ध्यान अध्ययन में रुचि
आज के आधुनिकता के दौर में बच्चों को संस्कारित करने के लिए क्या किया जाए, उक्त बात पर विचार करने पर देखें तो सबसे बड़ा माध्यम पाठशाला है और पाठशाला में ही बच्चे संस्कारित, धार्मिक, नैतिकता व समाज से जुड़ते हैं। जैन धर्म को आगे बढ़ाने में पाठशाला का मुख्य योगदान है। | आजकल स्मार्ट अध्ययन का जमाना है। पाठशाला में रोचकता केसे हो, इसके लिए पाठशाला द लर्निंग प्रोग्राम में खेल-खेल में सीखो, ज्ञान, कविताओं व कहानियों के माध्यम से इसमें रोचकता लाई जाए | इसके लिए इस पुस्तक में छोटे बच्चों के हिसाब से 'देखो और सीखो” पर विशेष ध्यान दिया गया है। यह पुस्तक निश्चित ही पाठशालाओं में बच्चों व युवाओं को धर्म से जोड़ने के लिए उपयोगी होगी | इसके पुस्तक के प्रेरणास्रोत व मार्गदर्शक परम पूज्य श्रमण रत्न 08 मुनि श्री निर्मोह सागर जी महाराज हैं तथा इस पुस्तिका के प्रकाशन में श्रीमती विद्या जैन धर्मपत्नि स्व.श्री सुमत प्रसाद जैन एवं समस्त यू.जी.एस. परिवार, मेरठ का भी बहुत सहयोग रहा है। में इन सभी का हृदय से आभार व्यक्त करता E | सम्पर्क सूत्र:
पंच परमेष्ठी जैनों के तीन चिह्न चौबीस तीर्थंकर जीव-अजीव जीव-अजीव का कारण जीव-अजीव इन्द्रिय एवं इन्द्रियों के विषय मन्दिर जी की वस्तुएँ कषाय जैन पर्व धार्मिक नारे निर्मोह कविताएँ घड़ी से ध्यान-घड़ी से माला 24 तीर्थंकरों का सम्पूर्ण परिचय
जैन धर्म शिष्य : जैनधर्म किसे कहते हैं? गुरूजी : जो जिनेन्द्र के द्वारा कहा हुआ धर्म है, वह जैन धर्म कहलाता है। शिष्य : जिनेन्द्र भगवान किसे कहते हैं? गुरूजी : जो राग-द्वेष आदि दोषों से रहित होने के कारण वीतराग कहे जाते हैं, जो प्रत्येक द्रव्य की अनंत पर्यायों को जानने वाले होने से सर्वज्ञ कहे जाते हैं, जो संसारी जीवों को हित का उपदेश देने से हितोपदेशी कहे जाते हैं। इस प्रकार जिस भगवान में वीतराग, सर्वज्ञ व हितोपदेशी तीनों विशेषण पाये जायें, उन्हें जिनेन्द्र भगवान कहते हैं। शिष्य: जेनधर्म किसने चलाया है? गुरूजी : इसका चलाने वाला कोई नहीं है। यह धर्म तो अनादिकाल से होने के कारण शाश्वत धर्म है। बीच-बीच में इसका प्रवर्तन होता रहता है । इस अवसर्पिणी के तृतीय, चतुर्थ काल में जो चौबीस तीर्थंकर भगवान हुये थे, उनमें से भगवान ऋषभदेव प्रथम तीर्थंकर थे और भगवान वर्द्धमान चौबीसवें तीर्थंकर थे। भगवान वर्द्धमान ने जो उपदेश दिया था, वही आज तक शास्त्रों में लिखा हुआ चला आ रहा है। शिष्य : जैनधर्म कितना प्राचीन है? गुरूजी : जबसे सृष्टि है, तभी से जैन धर्म विद्यमान है | सृष्टि का प्रारम्भ कभी नहीं हुआ। यह तो अनादिकाल से चली आ रही है, इसलिए जैन धर्म भी अनादिकाल से है। इसके अंतिम प्रवर्तक भगवान वर्द्धमान का निर्वाण लगभग 2530 वर्ष पूर्व हुआ था। शिष्य: भगवानवर्द्धमान के अनुसार जैन धर्म के मूल सिद्धांत कया हैं? गुरूजी : इसके कुल सिद्धांत चार हैं- . अहिंसा, 2. अपरिग्रह, 3. स्याद्वाद, 4. अनेकान्त | शिष्य : जैनदर्शन की क्या-क्या विशेषतायें हैं? बताइए गुरूजी : जैन दर्शन ईश्वर को विश्व या सृष्टि का कर्ता नहीं मानता। इस दर्शन में सृष्टि का बनाने वाला या रक्षा करने वाला या नाश करने वाला कोई नहीं है। सृष्टि अनादिकाल से है और अनंत काल तक रहेगी | शिष्य: Teo, फिर संसार को किसने बनाया है, बिना बनाये संसार कैसे बन सकता है? गुरूजी : इस सृष्टि को रचने वाला कोई नहीं है । यह तो अनादिकाल से अर्थात् हमेशा से इसी प्रकार चली आ रही है, जैसे सूर्य, चन्द्रमा हमेशा से इसी तरह उदय और अस्त होते हैं। छहों ऋतुएं अपने समय से आती हैं और चली जाती हैं | फूल खिलते हैं और झड़ जाते हैं| यह सब स्वभाव से होता है, इसका करने वाला कर्ता कोई नहीं है। fay
जो आत्मा के पदों और गुणों में सबसे बड़े होते हैं तथा राजा, महाराजा व इन्द्र भी जिनको सिर झुकाते हैं, Se परमेष्ठी Hed हैं। परमेष्ठी पाँच होते हैं- . अरिहंत, 2. सिद्ध, 3. आचार्य, 4. उपाध्याय, 5. साधु 4. अरिहंत- जिन्होंने चार घातिया कर्मों का नाश कर दिया है, जिनमें छियालीस मूलगुण होते हैं और अठारह दोषों से रहित होते हैं, उन्हें अरिहंत परमेष्ठी कहते हैं। 2Re जिन्होंने आठों कर्मों का नाश कर दिया है और ate मूलगुणों से सहित होते हैं, लोक के अग्रभाग में विराजमान हैं, उन्हें LY ) सिद्ध परमेष्ठी कहते हैं। 3. आचार्य- जिन मुनिराज के छत्तीस मूलगुण होते हैं, जो संघ के नायक हैं और अपने शिष्यों को शिक्षा, दीक्षा, प्रायश्चित और धर्मोपदेश देते हैं, उन्हें आचार्य परमेष्ठी कहते हैं। 4. उपाध्याय- जो मुनिराज संघ में रहकर Way शिष्यों को पठन-पाठन का कार्य कराते हैं एवं जिनके 25 मूलगुण होते हैं, उन्हें Prim उपाध्याय परमेष्ठी कहते हैं। (| 5. साधु- OSIM, ध्यान, तप में लीन रहते हैं तथा आरम्भ, परिग्रह से रहित होते हैं एवं —_ eH. जिनके 28 मूलगुण होते हैं, उन्हें साधु rao परमेष्ठी कहते हैं।
हमें बड़े भाग्य से उच्च कुल एवं जैन धर्म की प्राप्ति हुई है। अत: हमें अपना आचरण, खान-पान. आदि भी धर्म के अनुसार उचित बनाना चाहिए, जिसके लिए तीन बातों पर ध्यान देना अत्यन्त _ आवश्यक है- 4. देवदर्शन- हमें प्रतिदिन प्रातः:काल श्री जिनेन्द्र भगवान के दर्शन अवश्य करने चाहिए, जिसकी विधि इस प्रकार है- प्रात: उठते ही णमोकार मंत्र का स्मरण करना चाहिए। उसके बाद Avr, स्नान आदि क्रियाएँ कर, शुद्ध वस्त्र पहनकर हाथ में सामग्री लेकर, जीव-जन्तुओं की रक्षा करते हुए जिनमंदिर जाना चाहिए। मन्दिर के बाहर जूते-चप्पल उतारकर पानी से हाथ-पैर धोकर, भगवान की जय-जयकार करते हुए तीन बार नि:सहि, निःसहि, निःसहि बोलना चाहिए। इसके बाद ओम् जय, जय, जय, नमोस्तु, नमो5स्तु,नमो5सस््तु बोलते हुए अष्टद्र॒व्य या अक्षत (चावल) चढ़ाना चाहिए। पश्चात् णमोकार मंत्र बोलना चाहिए, इसके बाद धोक देनी चाहिए। इसके उपरांत णमोकार मंत्र का माहात्म्य (Tal पंच णमोयारो....) तथा 24 तीर्थकरों के नाम बोलने चाहिए। इसके बाद प्रभु पतित पावन आदि स्तुति बोलते हुए भगवान की तीन प्रदक्षिणा देनी चाहिए। प्रदक्षिणा देते समय सभी दिशाओं में भगवान की तरफ देखते हुए नमस्कार करना चाहिए। इसके बाद पुन: धोक देकर गंधोदक लगाते समय यह मंत्र बोलना चाहिए- निर्मल निर्मलीकरणं, पवित्र पापनाशनम् | जिन गंधोदक वंदे, अष्ट कर्म विनाशनम् || _ इसके उपरांत नौ बार णमोकार मंत्र पढ़ने के बाद मंदिर जी में रखे हुए शास्त्र अवश्य पढ़ने | यदि समय हो तो णमोकार मंत्र की एक माला जपनी चाहिए एवं भगवान की तरफ पीठ न PRA हुए मंदिर जी से बाहर आना चाहिए कर है 75)
, मंदिर जी में चमड़े आदि की अशुद्ध वस्तुएँ पहनकर नहीं जाना चाहिए। 2. झूठे मुँह मंदिर जी में प्रवेश नही करना चाहिए। 3. हाथ-पैर धोकर ही मंदिर जी में प्रवेश करना चाहिए। 4. मंदिर जी में जब तक दर्शन करें, तब तक भगवान की मूर्ति की ओर देखना चाहिए। दुसरी ओर नजर नहीं करनी चाहिए तथा किसी अन्य से कोई बात भी नहीं करनी चाहिए। 2. रात्रि भोजन त्याग- जीवों की रक्षा करना हमारा प्रमुख कर्त्तव्य है। दिन में सूर्य की किरणें जीवों को उत्पन्न नहीं होने देती | जैसे हम देखते हैं कि बारिश के दिनों में सूर्य अस्त होते ही बिजली के बल्ब पर कीड़े आने लगते हैं जबकि वे दिन में नहीं आते। इससे सिद्ध है कि दिन में जीवों की उत्पत्ति बहुत कम या नहीं होती । इसलिए हमको दिन में ही भोजन बनाना एवं करना चाहिए। रात्रि में भोजन करने से मांस भक्षण जैसा दोष लगता है। रात्रि में भोजन करके सो जाने पर पाचन क्रिया खराब हो जाती है, जिससे कई प्रकार के रोग उत्पन्न हो जाते हैं। रात्रि में भोजन करते समय सूर्य की अल्ट्रावायलेट किरणों का अभाव रहता है और हमें पूर्ण रूप से विटामिन “डी” नहीं मिल पाता है। अतः भोजन दिन में ही करना चाहिए। 3. पानी छानकर पीना- पानी की एक दूँद में असंख्या जीव होते हैं, ऐसा जैनाचार्यो ने बताया है । बिना BA पानी से उन जीवों का घात होता है और स्वास्थ्य भी बिगड़ता है। वैज्ञानिकों ने भी बिना छने पानी की एक बूँद में 36,450 जीव बताये हैं। इसलिए सदा ही पानी छानकर पीना चाहिए। पानी छानने के लिये मोटे कपड़े का दोहरा छन्ना होना चाहिए (जिससे सूर्य की रोशनी न दिखे) | छना हुआ पानी 48 मिनट तक त्रस जीव रहित रहता है, तदुपरांत उसमें त्रस जीव उत्पन्न हो जाते हैं अत: उसे फिर से छानना चाहिए। tAY
(नाम छंद) (चिह्न छंद) ऋषभ अजित संभव अभिनंदन, बैल हाथी घोड़ा बंदर, सुमति पद सुपाश्व जिनराय। चकवा लाल कमल स्वस्तिक। चंदपुहुप शीतल श्रेयांस-जिन, अर्धचंद्र मगर कल्पतरु, वासुपूज्य पूजित सुरराय। गैंडा भेंसा सूकर इक॥ विमल अनंत धर्म जस-उज्ज्वल, सेही बज्दंड हिरण अज, शांति Hey st मल्लि मनाय। मछली और कलश सिरताज। मुनिसुत्रत नमि नेमि पार्श्वप्रभु, कछुआ नीलकमल नमिजी का, AGU पद शीश नमाय॥ शंख सर्प सिंह चौबीस ताज॥ दो गोरे दो Ula, at हरिहर दो लाल। सोलह कंचन वरण हैं, fers नमहुँ तिहुँकाल॥ (वर्ण) चंद्रप्रभ एवं पुष्पदन्त - Bag aot (2 मुनिसुव्रतनाथ एवं नेमिनाथ. - श्यामवर्ण (काले). © पद्मप्रभ एवं वासुपूज्य - लाल वर्ण छे सुपाश्वनाथ एवं पाश्वनाथ_- हरित वर्ण (हरा) e@ शेष सोलह तीर्थकरों का - SR aur (पीला O (my
श्री ऋषभदेव जी (आदिनाथ) श्री सुमतिनाथ जी चिह्न - चकवा 6 श्री पदमप्रभ जी चिह्न - लाल कमल श्री अजितनाथ जी
श्री पुष्पदन््तनाथ जी Ue श्री विमलनाथ जी चिह्न - सूकर श्री शीतलनाथ जी 4 श्री अनंतनाथ जी चिह्न - कल्पवृक्ष चिह्न - सेही ie rt) श्री श्रेयांसनाथ जी श्री धर्मनाथ जी चिह्न - गैंडा चिह्न - वज्दण्ड श्री वासुपूज्य जी श्री शान्तिनाथ जी चिह्न - मैंसा चिह्न - हिरण
श्री नमिनाथ जी श्री अरहनाथ जी श्री नेमिनाथ जी चिह्न - मछली चिह्न - शंख 23 श्री पार्श्वनाथ जी श्री मल्लिनाथ जी
जीव- जो जानता है, देखता है, सुख-दुख का अनुभव करता है, वह जीव कहलाता है। जीव- मैंजीव हूँ। मुझमें ज्ञान है। मैं ज्ञान से जानता हूँ। अजीव- जो ना जानता है, ना देखता है और ना ही सुख-दुख का अनुभव करता है, वह अजीव कहलाता है। अजीव- शरीर अजीव है। उसमें ज्ञान नहीं है। वह कुछ जानता नहीं है। जीव-अजीव परीक्षा तुम्हारे में क्या है? - ज्ञान, ज्ञान, ज्ञान। तुम ज्ञान से क्या करते हो? - जानते हैं, जानते हैं, जानते हैं बोलो शरीर क्या है? - अजीव, अजीव, अजीव। lay
मनन em we me me mst eich tab tt a की री की ४ श्री री कर झ# व-अजीव का कार का क्योंकि यह जानता है, देखता है और सुख-दुख का अनुभव करता है। यह क्या है? अनुभव करता है। बंदर कुत्ते सर्प या बिल्ली, चिड़ी कबूतर तोता Tat | THAT मच्छर और ततैया, बकरी भेंस या मुर्गी गैया॥ सभी जीव कर्मों के मारे, हो भयभीत भटकते सारे। नहीं किसी को कभी सतायें , सावधान रह सदा बचायें॥ सिद्ध बनूँगा मेरा ज्ञान मैं सिद्ध भगवान बनूँगा, देखो मेरा ज्ञान प्रकाश, सिद्धालय में जाऊँगा। सदा रहे यह मेरे पास। 380 स्वभाव साधन के द्वारा आँखें खोलो सब पर है, .._ परम सुखी हो जाऊँगा॥ आतम ही अपना घर है॥
बिल्ली पंखा पहाड़ आलू प्याज गाड़ी
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eee रा Pees 5 PWN PN कर कर हु हु YN PN ४४८ ४४ ५७५ ७0५, 7. स्पर्शन 2. रसना 3. प्राण 4. चक्षु 5. कर्ण staat & के विषय ठण्डा (बर्फ) चिकना (घी) 4. स्पर्शन g खटूटा (नींबू) 2. रसना ce कसैला SS (आँवला)
इन्द्रियों के विषय 3. प्राण काम की बात सुनना भजन सुनना छः की बात सुनना मुनि वचन सुनना
गंधोदक मंत्र अष्ट प्रातिहार्य निर्मल निर्मलीकरणं , पवित्र पापनाशनं। तरु अशोक तल, सिंहासन पर, जिन गंधोदक वंदे, अष्ट कर्म विनाशनं॥ ..__* ऊत्र संग जिनवर शोभें। भामंडल Bit, चँवर ढुरें जहाँ, अष्ट मंगल पुष्पवृष्टि, दुंदुभि मन मोहें॥ दर्पण, कलश, ध्वजा और ठोना, सब भाषामय दिव्यध्वनि ही, Ba, चमर, झारी, बीजना। भवि जीवों को शिवमग खोलें। ये सब हैं अष्ट मंगल द्रव्य, आठों प्रातिहार्य युत प्रभु को, जिनप्रतिमा संग दिखते भव्य॥ समवशरण में लख भवि डोलें॥ मंदिर जी में घंटा बाजे टन-टन-टन... केशरिया झण्डा मंदिर जी में घंटा बाजे टन-टन-टन... कैसा न्यारा प्यारा झण्डा, मंदिर जी जायेंगे, पूजा रचायेंगे। हम सबको हर्षाता झण्डा, पूजा रचायेंगे, स्वाध्याय करेंगे॥ HINA झण्डा केशरिया झण्डा, मंदिर जी जायेंगे, पूजन करेंगे। स्वस्तिक से शोभित है झण्डा, पापा को लायेंगे , मम्मी को लायेंगे॥ वीर प्रभु का INT झण्डा, मंदिर जी जायेंगे, स्वाध्याय करेंगे। विद्वानों ने धारा झण्डा॥ .. दादा को लायेंगे, दादी को लायेंगे॥ चेतन बाग पे जाएँगे, हम AUST लहरायेंगे, जा, जी जायेंगे, भक्ति करेंगे। सब मिलकर फिर गायेंगे, tara लायेंगे, भाभी को लायेंगे॥ Sawa TR,
जिन प्रतिमा सिंहासन (जिनेन्द्र देव को विराजमान करने का स्थान) (राग-द्वेष से रहित वितरागता के धोतक) (प्रभु के विराजमान होने का स्थान) जिनवाणी अभिषेक कलश (वीतरागता की पोषक, स्याद्वाद वाणी) (मंगल सूचक) (मंदिर में अभिषेक के लिए प्रयोग किये जाये वाले कलः दान-पात्र घंटी गंधोदक पात्र (गुप्त दान देने हेतु पात्र) (शुभ सूचक) (गंधोदक रखने का पात्र) aay जापमाला चौकी (प्रभु की पूजन, भक्ति में प्रयुक्त) (णमोकार आदि मंत्रों के जाप करने में उपयुक्त) (पूजन की थाल एवं जिनवाणी रखने हेतु उपयोगी)
मंदिर जी की वस्तुएँ झारी ध्वजा दर्पण (अष्ट मंगल द्रव्यों में से एक) (जिनशासन की पताका शिखर पर लगती है) अष्ट मंगल द्रव्यों में से एक) elie स्वस्तिक पंखा (चार गतियों का प्रतीक) (तीनों लोकों के स्वामी होने का द्योतक) (अष्ट मंगल द्रव्यों में से एक) पांडुकशिला पूजन थाली रेहल (प्रभु के अभिषेक हेतु उपयोगी) (अष्ट द्रव्य रखने हेतु उपयोगी) (जिनवाणी रखने हेतु उपयोगी) कलश जैन ध्वज पंचमेरू (मंगल का सूचक) (जैन धर्म का प्रतीक) (ढाईद्वीप में विराजमान Si जनाः i
_ मंदिर जी age मांडना तीन लोक समवशरण (विधान हेतु उपयोगी) चारों गतियों के जीवों के रहने का रथान बताने वाला (जिनेन्द्रदेव की धर्म सभा, ओम मानस्तम्भ द्रव्य की डिब्बी (पंचपरमेष्ठी का द्योतक) (मान को गलाने वाला) (घर से द्रव्य ले जाने में उपयोगी) पानी का छन्ना ठोना धोती-दुपट्टा (जीवों की रक्षा हेतु) (स्थापना हेतु) (शुद्ध वस्त्रों का द्योतक) चटाई दुंदुभि भामण्डल (मंदिर में शुद्धतापूर्वक बैठने हेतु उपयोगी) (देवों द्वारा बजाया जाने वाला वाद्ययंत्र) (जिसमें जीव के सात भव नल.
कषाय | गुड्डू एक लड्डू को पाकर, रोने लगा कोने में THe | मेरा लड्डू छोटा भाई, बड़ा मिले तो Us माई | | जब तक सबने लड्डू खाया, कोने में एक बिच्छू आया। SH लगा तो WA गुड्डू, चूहे खा गये उसका AST! | गुड्डू ने ये सौगन््ध खाई, हठ न करूँगा कभी भी ag | हम सब ने यह शिक्षा पाई, जिद न करेंगे कभी भी भाई || क्रोध कहें गुस्से को, भाई! एक कषाय के बच्चे चार, मान घमंड को कहते हैं। सबको घुमाते संसार | माया छल-कपट कहलाती, पहला क्रोध दूसरा मान, लोभ लालच को कहते हैं।। तीजी माया चौथा लोभ | चार कषायें हैं दुखदायी, चारों मिलें तो भव का रोग, आतम को ये कसती हैं। चारों fae तो eta निरोग | । इन्हें त्याग देते जो प्राणी सुख अनंत वे पाते हैं।। सीधी रेखा पुर कि सीधे खड़े-खड़े कर पूजन-ध्यान। तिरछे भाव कभी ना लाना, तुम हो सरल भाव की खान।। गुरू को पूजो, प्रभु को ध्याओ, न खा चक्कर चहुंगति जान। आत्मध्यान कर सीधे जाओ, मुक्तिपुरी, लो सुख sre | | मान माया
क्रोध कषाय (Anger) (गुस्से को क्रोध कहते हैं) झगड़ा करना रोना स्वयं को चोट लगाना हमला करना धमकी देना मान कषाय (Pride) (घमण्ड को मान कहते हैं) नजरों से गिराना किसी को जलाना रूप का अभिमान बल दिखाना युद्ध करना बहस करना बात न a
माया कषाय (Fraud) (छल-कपट को माया कहते हैं) बहाने बनाना चुगली करना नकल करना उकसाना मजाक बनाना रूकावट डालना पीठ पीछे मारना लोभ कषाय (Greed) (लालच को लोभ कहते हैं) बेईमानी करना अधिक इकट्ठा करना इनाम की इच्छा करना जुआ खेलना चोरी करना उधार लेना अपहरण करना आकर्षित करना
जैन पर्व पर्व का अर्थ पवित्र दिवस होता है अर्थात् वह मुख्य, विशेष या पवित्र दिवस, जिसमें श्रावक ज्ञान एवं सदाचरण के द्वारा आत्मशुद्धि या आत्मकल्याण करता है। अपने अधिक समय को धर्मध्यान, स्वाध्याय आदि में लगाना है। जैन पर्व के मुख्यतः तीन प्रकार हैं-4. साधारण पर्व, 2. नैमित्तिक पर्व, 3. नैसर्गिक पर्व | (4) साधारण पर्व - अष्टमी, चतुर्दशी, पंचमी आदि प्रतिमाह ee होते हैं। प्रत्येक माह की अष्टमी, चतुर्दशी और पंचमी AE को नित्यपर्व भी कहा है। aK (2) नैमित्तिक पर्व - जो महापुरुषों के निमित्त से होते हैं, वे | नैमित्तिक पर्व कहे जाते हैं, जैसे- दीपावली, महावीर जयन्ती, रक्षाबंधन आदि | कई 4. दीपावली पर्व - कार्तिक कृष्णा चतुर्दशी को रात्रि | के अन्तिम पहर में और अमावस्या के प्रात:काल के समय अंतिम तीर्थंकर महावीर स्वामी को निर्वाण प्राप्त हुआ था, वहीं सायंकाल के समय खिल, गौतम गणधर स्वामी को केवलज्ञान की प्राप्ति हुई '$ थी। इसीलिए दीपावली को पर्व रूप में मनाया जाता है। 2. महावीर जयन्ती - महावीर जयंती पर्व चैत्र शुक्ला AVA को भगवान महावीर के जन्म महोत्सव के रूप में मनाया जाता है। 3. रक्षाबंधन पर्व - रक्षाबंधन पर्व श्रावण माह की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस दिन 700 मुनियों की रक्षा विष्णुकुमार मुनि ने की off विघ्न दूर होते ही प्रजा ने खुशियाँ मनाई और मुनिसंघ को स्वास्थ्य के अनुकूल आहार दिया, वैयावृत्ति की बहनों ने इस पर्व की स्मृति में भाइयों की कलाई में रक्षा का सूत्र बाँधा। तभी से इस पर्व का नाम भारतवर्ष में रक्षाबंधन के नाम से प्रसिद्ध हुआ। (3) नैसर्गिक पर्व - जिनमें महापुरुषों की जीवन घटना का कोई निमित्त नहीं है परन्तु जो अनादि काल से चले आ रहे हैं, वे नैसर्गिक पर्व कहे जाते हैं, जैसे- दशलक्षण पर्व, षोडशकारण पर्व, अष्टाहिका पर्व आदि। ये पर्व भूत, भविष्य, वर्तमान तीनों कालों में अहर्निश चलते रहते हैं।
जैन पर्व l. दशलक्षण पर्व - यह पर्व वर्ष मे तीन बार माघ-चैत्र-भाद्गपद मास में आता है।परन्तु सामान्यतः यह पर्व भाद्रपद में ही मनाया जाता है। इस पर्व में आत्मा के उत्तम क्षमादि दश धर्मों/गुणों की आराधना की जाती है। 2. सोलहकारण पर्व - प्रतिवर्ष सोलहकारण पर्व भाद्गरपद कृष्णा प्रतिपदा से प्रारम्भ होकर आश्विन कृष्णा प्रतिपदा तक मनाया जाता है।इस पर्व में घोडशकारण भावनाओं का चिन्तन किया जाता है। शास्त्रों में 6 भावनायें कही गई SISA भावनाओं से तीर्थंकर प्रकृति का बंध होता है। इस प्रकृति के उदय से समवशरण में अष्ट प्रातिहार्य रूप विभूति प्राप्त होती है। 3.अष्टह्मिका पर्व - प्रतिवर्ष कार्तिक-फाल्गुन-आषाढ की शुक्ला अष्टमी से पूर्णिमा तक तीन बार आता है, जो बडे धूमधाम से मनाया जाता है। इस पर्व में नन््दीश्वर द्वीप में स्थित अकृत्रिम जिनालयों की देवगण पूजा अर्चना करते हैं।मनुष्य अपनी शक्ति की लघुता को ध्यान में रखकर यहाँ पर ही जिनमन्दिर में नन्दीश्वर द्वीप और जिनबिम्ब की कल्पना कर पूजन किया करते हैं। इन दिनों लोग प्रायः नन्दीश्वर द्वीप मण्डल विधान की पूजा करते हैं। इनपर्व के दिनों में विशेष रूप से व्रत, नियम, संयम का पालन करना चाहिए तथा अपनी शक्ति के अनुसार एकासन-उपवास करते हुए आत्मा का चिन्तन करना चाहिए। अभ्यास प्रश्न l. पर्वकिसेकहतेहैं? 2. जैनपर्वके कितने भेद होते हैं ? 3. दीपावलीपर्व क्यों और कब मनाते हैं ? 4. अष्टहिकापर्व वर्ष में कितनी बार आता है और कब-कब ? 5. हमेंपर्वोंमेंक्याकरनाचाहिए ? 99)
4. Ages बन जाओ परमात्मा 2. वस्तु स्वभाव धर्म है राग-द्वेष अधर्म है 3. वस्तु स्वभाव पहचान लो जीव-अजीव जान लो 4. जिनवाणीने क्या दिया शुद्धातम दिखला दिया 5. शुद्ध-बुद्ध मैं चेतन हूँ रागभाव से भिन्न हूँ 6. गुरूके पथपर बढ़ना है सम्यक चारित्र धरना है 7. मात-पिता का आदर जहाँ संस्कारों का सागर वहाँ 8. ज्ञान॑ज्ञानंज्ञानंआ रागंरागं रागं जा 9. आतम आतम आतम जान सुखमय सुखमय सुखमय मान 40. जिनवाणी को सुनना है हित-अहित समझना है Haas फँसी जिन्दगी कैसे सुनेंगे प्रभु की धुनी 42. सदाचार यदि पाना है भक्ष्य-अभक्ष्य समझना है 43. हाय हैलो छोड़िये जय जिनेन्द्र बोलिए 4. जड़-चेतन में भेद जहाँ सच्चा मुक्ति मार्ग वहाँ 5. कलयुग के हैं तीन डाकू मांस, मदिरा, तम्बाकू i6. महावीर को ध्यायेंगे परमेष्ठी पद पायेंगे 47. तीर्थंकर की महिमा गाओ जैनधर्म की शान बढ़ाओ 48. एक, दो, तीन, चार जैनधर्म की जय जयकार 49. Wd, B:, सात, आठ जैनधर्म का पढ़ लो पाठ 20. नो, दस, ग्यारह, बारह जैनधर्म का बजा नगाड़ा 2i. aXe, चौदह, पंद्रह, सोलाह जैनधर्म का बच्चा बोला 22, Walz, अठारह, उन्नीस, बीस जैनधर्म की हो गई जीत 23. इक्कीस, बाईस, Aga, चौबीस जैनधर्म के तीर्थकर चौबीस 24, जबतक सूरज चाँद रहेगा मुनियों का सम्मान रहेगा 25. जबतक सागर में है पानी मुनियों की है अमर कहानी 26. कुंदकुन्द ने क्या दिया भगवान आत्मा बता दिया 27. त्रिशलानंदन वीर की जय बोलो महावीर की 28. आतम करता कौन खराब राग-द्वेष और मिथ्यात्व 29. मानव जीवन की पहचान जिनदर्शन कर आतम जान 30. इस जीवन का क्या उद्देश्य सम्यक दर्शन प्राप्त करो 3i. घर-घर से निकले आवाज सत्य अहिंसा जिंदाबाद 32. रत्नत्रयकी एकता मोक्ष मार्ग की विशेषता 33. जयहो सब अरिहंतों की वीतरागी मुनि संतों की 34. सिद्धारथत्रिशला के लाल जीवों को कर गये निहाल
मिलता है सच्चा सुख केवल, भगवान तुम्हारे चरणों में | यह विनती है पल-पल छिन-छिन रहे ध्यान तुम्हारे चरणों में I जिह्ना पर तेरा नाम रहे, तेरी याद सुबह और शाम VE | बस काम ये आठों धाम रहे, रहे ध्यान तुम्हारे चरणों FTL चाहे काँटों पर ही चलना हो, चाहे छोड़ के देश निकलना हो। चाहे जंगल मैं जा रहना हो, रहे ध्यान तुम्हारे चरणों में | |2 | निशदिन मैं दीप जलाता हूँ, फिर भी मन में क्यों अँधेरा है। प्रभु ज्ञानदीप हमको दे दो, रहे ध्यान तुम्हारे चरणों में | ।3 | | चाहे बैरी कुल संसार रहे, चाहे जीवन मुझ पर भार रहे। चाहे मौत गले का हार रहे, रहे ध्यान तुम्हारे चरणों में | |4॥। चाहे संकट ने मुझे घेरा हो, चाहे चारों ओर अँधेरा हो । पर मन न डगमग मेरा हो, रहे ध्यान तुम्हारे चरणों में | ।5 || भव सिंधु के प्रभु खिवैया तुम, इस भव से पार लगा दो Gal स्वीकार करो आरती मेरी, रहे ध्यान तुम्हारे चरणों में | ।6।। जीवन में हम कभी न भूलें, पंच प्रभु भगवान को I बड़े जनों का आदर करना, मात-पिता को शीश नवाना | कार्य सदा ऐसा ही होवे, जीवन में सम्मान हो II जिनवाणी की बात सुनेंगे, पाप भाव से दूर रहेंगे। सत्य मार्ग पर चलें सदा ही, मुक्तिपुरी विश्राम हो |।2।। जिनवर दर्शन रोज करेंगे, सदाचार से सदा रहेंगे। ree अहिंसामय हो जीवन, यही हमारी शान हो 3 se eee eee
प्रात: जल्दी उठकर के मैं णमोकार का ध्यान करूँ | माता-पिता सब बड़े जनों के चरणों में नित्य प्रणाम करूँ I शुद्ध वस्त्र पहनकर मैं तो जिनमन्दिर को जाऊंगा | जिनदर्शन से पूर्व कभी भी भोजन न मैं खाऊंँगा | जैन धर्म की शिक्षा लेने पाठशाला जाऊंगा | गुरूजन का सम्मान करूँ मैं संस्कार को पाऊँगा ।। रात्रि भोजन नहीं करूँ मैं छना हुआ जल पीऊंँगा | जैन कुल में जन्म लिया है जैनी बनकर जीऊँगा ।। जिनवाणी पढ़कर के मैं भी मोक्षमार्ग की राह चलूँ | निज आतम का ध्यान करूँ मैं, सिद्ध दशा को प्राप्त करूँ || मेरे गुरूवर अच्छे हैं, मेरे गुरूवर सच्चे हैं। घर-गृहस्थी का काम नहीं, कोई भी जंजाल नहीं। आतम सुख ही भजते हैं, मेरे गुरूवर अच्छे हैं। राग-द्वेष न करते हैं, समता धारण करते हैं। पाप कोई न करते हैं, मेरे गुरूवर अच्छे हैं। मैं भी अच्छा जरूर बनूँगा, इक दिन मैं भी मुनि बनूँगा। . निज आतम में रहकर मैं भी, अनन्त सुख को प्राप्त करूँगा।
नी नि? नि नी नी blu की अर Dalal 4 ob महक कक हर हु व हर रच हाफ जैनी जैनी जैनी जैनी YES भेया रात्रि भोजन NO भैया छान के पानी YES भेया जिन दर्शन कर आ हा हा हा। रात को मैं सोया था मम्मी आवाज आई हू हू हू मुझको ऐसा लगा कि बोला अगला नंबर तू तू तू आँख बंद कर शांत बैठकर पंच प्रभु स्मरण किया णमोकार का मंत्र याद कर भय को मैंने भगा दिया। अरे! शहद क्यों खाते हो? कितना पाप कमाते हो? यह AEN का थूक है। तुमको लगता जूस है। कितनी rere मर जातीं। अग्नि में ही जल जार्ती | कभी न खाना मानों सीख ताली बजाओ हो गई जीत।
निर्मोह कविताएँ जंगल जंगल बात चली है, पता चला है। इक ग्वाले को पेड़ के अन्दर, ग्रन्थ मिला है।। एक था ग्वाला भोला-भाला जंगल पहुँचा, सब जंगल में आग लगी थी उसने देखा। पेड़ के अन्दर सुन्दर-सुन्दर ग्रन्थ रखा था, खुश होकर उसको लेकर वह गाँव चला था। मन में सोचे अनपढ़ वह क्यों नहीं पढ़ा है? | |2 | | महाभाग्य से एक दिवस मुनिराज पधारे, बड़ी विनय से शास्त्रदान कर चित्त हर्षाये। उसी भाव से ग्वाला मुनि कुन्दकुन्द हुआ है। |3 || पापा गये थे बाजार, वहाँ से लाये थे अचार। अचार में दिख गई इल्ली, हँस रही मौसी बिल्ली। मम्मी गाती गाना, अचार कभी नहीं खाना।। एक गाँव में आई बरात, बज रहे थे शाम के सात | जैन अजैन सब मिलकर आये, भोजन को उन्हें सभी बुलाए ।। भोजन बन रहा रात में, साँप गिर गया शाक में | जैनी जन न रात में खाते, अजैनी उनको खूब चिढ़ाते |। स्वर्ग जाएँगे ये सब जन, सूख रहा है इनका तन | भोजन करने बैठे लोग, लग गया बेहोशी का रोग ।। उनको अस्पताल भिजवाया, Val ने निज फर्ज निभाया | रात्रि भोजन नहीं करेंगे, हम सब सच्चे जेन बनेंगे ।।
मेरा एक सुन्दर-सा घर है। मेरा एक प्यारा-सा घर है। उसमें जिनवाणी मंदिर है। छत पर पचरंगी जिनध्वज है। कलशा लेकर मैं खड़ा हूँ। मुनिवर को पड़गाऊँगा। नवधा भक्तिपूर्वक मैं तो आहार मुनि को कराऊँगा। नानी के घर जायेंगे हम। हलवा-पूड़ी खायेंगे हम।। नदी मिलेगी एक बड़ी जब। मिलकर नाव बनायेंगे हम ।। चढ़ जायेंगे उस पर हम। झटपट मोक्ष में जायेंगे हम | | देख पराँठा आलू का, मन ललचाया भालू का | मैं तो इसको GSM और मोटा हो जाऊँगा | बालक भालू से बोला, तू भालू भोला-भाला | तुमको नहीं है कुछ भी ज्ञान, तू बड़ा ही है अनजान | जो तुम आलू खाये हो, अत: यही भव पाए हो | क्या तुमको मोक्ष नहीं जाना, feta गति में ही रहना ? मैं तो मोक्ष में जाऊँगा, अब आलू नहीं खाऊँगा ।।
घड़ी से ध्यान-घड़ी से माला जैन धर्म में एक माला में मनके होते हैं। इन संख्याओं का महत्व आध्यात्मिक और दार्शनिक मान्यताओं में गहराई से निहित है | 08 FAS का जाप करने से साधक मोक्ष मार्ग की प्राप्ति कर सकता है | माला में 3 अतिरिक्त मनके तीन रत्नों का प्रतिनिधित्व करते हैं - () सम्यक दर्शन (2) सम्यक ज्ञान (3) सम्यक चारित्र ये सभी FAS साधकों को उनकी आध्यात्मिक यात्रा में मागदर्शन प्रदान करते = | स पोस्टर में सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान, सम्यक चारित्र घड़ी के 3 Hie की तरह है एवं 2 फूलों २ प्रत्येक में 9 बार 39 लिखा हुआ है जिसके माध्यम से आप 2 X 9 = 08 बार जाप कर सकते है, इसके माध्यम से माला का जाप करने पर कोई त्रुटि होने की संभावना कम रहती है | 9, BBBs
र्थकरों + सम्पूर्ण 24 तीर्थंकरों सम्पूर्ण परिचय Era | | श्री आदिनाथ जी _पीतवर्ण ett नाभिराय अयोध्या 84 लाख पू, 500 धनुष नीलांजना मृत्यु कैलाश पर्वत qe | श्री अजितनाथ जी tae विजयदेवी जितशत्रु अयोध्या 72लाखपू. sory बिजली गिरने से _ सम्मेदशिखरजी सप्तपर्ण | | श्री संभवनाथ जी toa राजी सेना राजाजितारी श्रावस्ती 60 लाख पू. 400 धनुष मेघ देखने से सम्मेदशिखरजी शात्मलि | श्री अभिनन्दननाथ जी पीलवर्ण Rear wR अयोध्या 50 लाखपू. 350 धनुष मेघों का विघटन. wera असन | | श्री सुमतिनाथ जी teat gir मेघरथ अयोध्या 40 लाखपू. 300 धनुष जाति स्मरण सम्मेदशिखरजी प्रियंगु | | श्री पदमप्रभ जी ae धरणराज कौशाम्बी 30 लाख पू. 250 धनुष जाति स्मरण सम्मेदशिखरजी प्रियंग | | श्री सुपाश्वनाथ जी et सुप्रतिष्ठ बनारस 20 लाख पू. 200 धनुष जाति स्मरण सम्मेदशिखरजी शिरीष | श्री चंद्रप्रभ जी शुक्ल वर्ण sem महासेन चन्द्रपुरी imeay omy आईना देखने से _ सम्मेदशिखरजी नाग ध श्री पुष्पदनन््तनाथ जी शुक्ल वर्ण om aia काकंदी 2लाखपू. 008 7a उल्कापात से सम्मेदशिखरजी नाग a श्री शीतलनाथ जी tot git द्रढदथराज भद्दलपुर (7TGY 90 धनुष हिमनाश(ओस की बूँद) सम्मेदशिखरजी बिल्व शा, श्री श्रेयांसनाथ जी toot वेणुदेवी विष्णु नरेंद्र सिंहपुरी 84 लाख वर्ष 80 धनुष पतझड़ से सम्मेदशिखरजी ict a श्री वासुपूज्य जी | जा . aq चम्पापुरी 72 लाख वर्ष 70 धनुष जाति स्मरण चम्पापुरी कदम्ब BI श्री विमलनाथ जी tot om क्रतवर्मम afte 60 लाख वर्ष 60 धनुष ओस विघटन...*देशिखरजी जम्बू | श्री अनंतनाथ जी tet gem सिंहसेन अयोध्या 30 लाखवर्ष 50 धनुष उल्कापात से सम्मेदशिखरजी पीपल व श्री धर्मनाथ जी tae ge भानुराजा रत्नपुरी waa 45 धनुष उल्कापात से सम्मेदशिखरजी सप्तच्छद सा श्री शान्तिनाथ जी _फीलवर्ण अचिरादेवी विश्वसेन हस्तिनापुर taraay 40 धनुष जातिस्मरण (दर्पण) सम्मेदशिखरजी नन्द्यावर्त ". श्री कुन्थुनाथ जी teeth सूर्य हस्तिनापुर 95 हजार वर्ष 35 धनुष जाति स्मरण सम्मेदशिखरजी तिलक श्री अरहनाथ जी Bowl देवीरानी सुदर्शन हस्तिनापुर 84 हजार वर्ष 30 धनुष मेघ फटने से सम्मेदशिखरजी आम्र | श्री मल्लिनाथ जी _कीलवर्ण रक्षिता . कुम्भा मिथिला 55 हजार वर्ष 25 धनुष लड़ित (बिजली) सम्मेदशिखरजी मेष श्रृंग (अशोक) a. श्री मुनिसुव्रतनाथ जी | पदगावती ya _ राजग्रही 30 हजार वर्ष 20 धनुष aaa सम्मेदशिखरजी चंपक a. श्री नमिनाथ जी tow om विजय मिथिला to हजार वर्ष 5 धनुष जाति स्मरण सम्मेदशिखरजी बकुल 2 aft नेमिनाथ जी | शिवदेवी समुद्रविजय सौरीपुर ima egy पशुओं का क्रंदन गिरनार पर्वत बाँस a श्री पार्श्वनाथ जी un अश्वसेन RCT TT जाति स्मरण सम्मेदशिखरजी SAG a श्री महावीर जी feet त्रिशला सिद्धार्थ कुण्डलपुर 72m | 7हाथ जाति स्मरण पावापुरी aE
rar निर्मोह वाटिका की डिजिटल प्रति हेतू क्यू-आर. स्कैन करें ries nig शऔणती TT GT ACT ज्॒.श्री FAS WSS ST BE GAC जैन - FT जैन, THM GAC UT - GIT GA SET जैज - TYA गैल, MCT छुआर GH - नौतू जैन STA जैन - शाही जैन, TASS जैन - बिशूति जन डॉ. SA, इंजी, कार्जद जैन, इंजी, TAT जैन, डॉ. SSH गन, आरब्णा, छुबा, FAA Ue PA FTI. परिवार मेरठ (Gar प्रदेश)